निष्ठापूर्वक मनाया गया मिथिला में चौरचन पर्व

निष्ठापूर्वक मनाया गया मिथिला में चौरचन पर्व


जनकपुरसहित मिथिलांचल क्षेत्रों में आज निष्ठा एबंउत्साह पूर्बक चौरचन पर्व मनाया जा रहा है।यह त्यौहार भादो महीने के शुक्ल चतुर्थीके दिन मनाया जाता है। मिथिलांचल में इसे बड़े त्योहार के रूप मेंमनाता है।

चांदकी पूजा करने वाले इस चौरचन पर्वमें  दालऔर चावल के आटे सेबनी पूड़ी, मिठाई, पिरुकिया और खीर, मिट्टीके बर्तन में जमाये गए दही, पकेकेले और अन्य फलऔर वस्त्र शामिल हैं।

उसीदिन, भादौ शुक्ल के चतुर्थी के दिन, सूर्यास्तके समय, चंद्रमा पर फल औरमिष्ठान अर्पण करते  हुए, घर के सदस्यों द्वाराचाँद को अर्घ दिया जाता है।

मिथिला क्षेत्र में, विशेषकर मधेशी समुदाय में, इस त्योहार कोविशेष महत्व के साथ मनायाजाता रहा है।

चौरचनअर्थात चौठचन्द्र  पूजाके लिए कोई अतिरिक्त सामग्री जुटाने की आवश्यकता नहींहै। सभी वर्गों और स्रोतों केलोग इसे व्यवस्थित कर सकते हैं।चौरचन के लिए महिलाको पूरे दिन निष्ठापूर्बक उपवास करना पड़ता है। एक या अधिकपरिवार के लोग भी उपवास करसकते हैं। 

अर्घ सामग्री में खीर, पूरी, मिष्ठान्न, पुआ आदि से बने होतेहैं। इस त्योहार केदौरान दही का विशेष महत्वहै। सभी घर के सदस्यों या भाकल किया गया लोगो के लिए अलग-अलग मिट्टी के बर्तनों में संग्रहीत किया जाता है, और व्यक्ति के अनुसार पूजा के स्थान पर रखा जाता है। इसी तरह, अर्घ दिए जाने वाले डाली भी उसी सामग्री के अनुसार रखकर पूजा की जाती है।

चंद्रमाके उदय से पहले, चिकनीमिटी वा गायके गोबरसे पूजा स्थल को लीपा जाताहै और उस स्थानको पवित्र किया जाता है। पूजा सामग्री के अनुसार अरिपनबनाया जाता है और उसीअरिपन पर पूजा सामग्रीको रखा जाता है , यह चावल केआटे से बना होताहै, जिसे पवित्र माना जाता है। 

एक पंक्ति मेंअर्घ सामग्री रखने के बाद, दीपकको थोड़ा कात में बनाये गए अरिपन परदीप प्रज्वलित कलश रखा जाता है। खीरे को केले केपत्ते पर दस पूरीसे ढक्का जाता है इसे मडरकहा जाता है

सामग्रीरखने के बाद, परिवारके सभी सदस्य चांद के उगने काइंतजार करते हैं। चाँद दिखाई देने के बाद, ब्रतालुमहिला ने अपनी सारी अर्घ सामग्रीके क्रमश चंद्रमाँ तरफ देखए हुवे मन में भाकल किया गया अपना बचन दोहराती है, अपने घर परिबार, बाल-बच्चा, पति और अपने  शरीर के स्वस्थ्य केकामना करते हुवे पूजा करती है  

जबयह क्रम समाप्त हो जाता है, तो घर के अन्यसदस्य खीरे, अन्य फलों  केसाथ चंद्रमा को देखकर अपनीइच्छाओं की पेशकश करतेहैं। मान्यता है कि चंद्रदेव उनकी मनोकामना पूरी करेंगे।

परिवारके एक सदस्य, जोचौठचन्द्र  त्योहारके दौरान पूजा में भाग लेते हैं, विशेष रूप से महिलाएं, जोपूरे दिन उपवास करती हैं और शाम कोगणेश और चंद्रमा कीपूजा करती हैं, और औपचारिक रूपसे त्योहार का समापन करतीहैं।

चंद्रमाकी पूजा करने वाले त्यौहार में दाल और चावल केआटे से बने पुरी, मिष्ठान भोजन (पिरुकिया) और दही, मिट्टीमें जमा दही, पके केले और अन्य फलोंऔर कपड़ों की पेशकश कीपरंपरा है। यह त्योहार विशेषरूप से मैथिली समुदायऔर थारू जाति में मनाया जाता है।

चंद्रमाकी निष्ठापूर्बक से पूजा, यानीचौरचन त्योहार, सुख, शांति, समृद्धि और कल्याण केपरिवारों में सार्वजनिक विश्वास रहा है। इस त्यौहार मेंकृषि फ़ीड और घर केबने व्यंजन अधिक उपयोग किए जाते हैं।


इसबार चौरचन पर्व की तिथि सोमवारको पड़ गई है। चौरचनपर्व के दौरान पड़ीशुक्ल चतुर्थी के महत्व और उपवास केकारण, चौथे दिन सोमवार को सुबह   बजे शुरू होगा। मिथिला में, इस त्योहार कोचौरचन, चौठचन्द्र  केरूप में भी जाना जाताहै।

पिरुकिया, खजुरिया , खाजा, पुरी और खीर पारंपरिकरूप से प्रसाद केरूप में घर-घर मेंउपयोग की जाती है।फलों के अलावा, दहीकी पूजा गणेश और चंद्रमा तिथिमें  कीजाती है। इस विश्वास केअनुसार कि चौथे दिनचंद्रदेव को खाली हाथनहीं देखा जाना चाहिए, जो परिवार चतुर्थी  चंद्रत्योहार का पालन करतेहैं, उनके हाथों में केला, सेब,  अनार, काकड़ा, घर का बनापकवान, मिठाई  केसाथ चन्द्रमा को अर्घ देनेकी परंपरा है।

लोक पर्वो,त्योहारोंकी उत्पत्ति की पुष्टि नहींकी जा सकती  है।जिस तरह से यह समाजअपनी आवश्यकता, रियायत आदि के आधार परइसे स्वीकार करता है, वह अभिलेखागार मेंनहीं पाया जाता है।

चौरचनके बारे में एक प्रसिद्ध प्रचलितकहानी के अनुसार, इसत्यौहार का पौराणिक महत्वभी स्थापित किया गया है क्योंकि श्रीकृष्ण ने स्यमन्तक माणिकसे जुड़े कलंक से छुटकारा पाया था ।

श्रीमद्भागवतमें एक कथा है।द्वापरमे  द्वारिकापुरीमे  सत्रजीतनामक एक गरीब यादवने भगवान सूर्य  कीपूजा करके एक बहुत हीसुंदर रत्न प्राप्त किया था। अनुष्ठान पूजा करने के बाद, यादवको उस मणि सेप्रतिदिन 2 मन  सोनामिलता था।

जबप्रसेनजित की मृत्यु औरमणि गायब होने की खबर राजाके पास आई, तो उनका शकश्रीकृष्ण पर गया। श्रीकृष्ण अपने ऊपर लगे कलंक मिटाने के लिए उसरत्न को खोजने केलिए जंगल में गए,  बहुतछानबीन करने के बाद, उपलब्धसाक्ष्य के आधार परउन्होंने एक गुफा मेंप्रवेश किया। 

श्रीकृष्ण के दस दिनोंसे अधिक समय तक गुफा सेबाहर नहीं आने के बाद, उनकेसाथ आए सैनिक निराशहो गए श्रीकृष्ण के लिए बहुतशोक शोकाकुल हुए।

समयबीतने के साथ, अठारहवेंदिन, कृष्ण मणि और एक सुंदरमहिला के साथ द्वारिका लौटे।वास्तव में, जाम्बन्त से लड़ाई करअंत में उसे उसे हराकर वह मणि केसाथ उनकी पुत्री जामवती को लेकर आएथे  

यह भाद्रशुक्ल चतुर्थी का दिन था।माना जाता है कि श्रीकृष्णके कलंक को मुक्ति केउस दिन को मनाने केलिए चंद्रपूजा की दिन केरूपमे रूपांतरित कर दिया गया, इसीबिच प्रदेश सरकारने प्रदेश में सार्बजनिक छुट्टी की घोसना कीहै 

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