जनकपुर के प्रसीद्ध शक्तिपीढ राजदेवी | janakpur ke prasidha shaktipith rajdevi

जनकपुर के प्रसीद्ध शक्तिपीढ राजदेवी

जनकपुर के प्रसीद्ध शक्तिपीढ राजदेवी- हिन्दुओं का महत्वपूर्ण पर्व विजया दशमी का चहल–पहल जनकपुर के प्रसीद्ध राजदेवी माता के मन्दिर मे देखा जा रहा है । इस साल आश्विन १२ गते ( २९ सेप्टेम्बर ) के दिन घटस्थापना है ।
मिथिलाञ्चल मे इस पर्वको भक्तिभाव और बहुत उत्साह पूर्वक मनाने की परम्परा रही है । घटस्थापना के दिन मिथिलाञ्चल के हरेक घर मे कलस स्थापना और जौं बो कर जमरा उगाई जाती है ।

जनकपुर सहित ग्रामीण क्षेत्र के हरेक शक्तिपीठ मे सर–सफाई और सर–सजावट लगायत की तैयारीयां प्रारम्भ हो चुकी है । दशमी भर हरेक शक्तिपीठ मे श्रद्धालु–भक्तजन की बडे पैमाने पर उपस्थिति देखा जा सकता है ।

जनकपुर के विभिन्न शक्तिपीठ मे उत्साहित भक्तजनों की भीड दिनभर लगा रहता है । उस मे भी जनकपुर क्षेत्र के अति विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण शक्तिपीठ राजदेवी माता की मन्दिर मे पुजा–आराधना के लिए श्रद्धालु–भक्तजनों का भीड लगा रहना अस्वभाविक नही है ।

शक्तिपीठों की परम्पार एवं प्राचीन मान्यता अनुसार विभिन्न रुप मे पुजा–अर्चना करने की परम्परा रहा है । इस क्षेत्र के प्रसीद्ध माता राजदेवी की पु्जा–पाठ करना भक्तजनों के लिए अपरिहार्य जैसा होता है । घण्टौं लाइन मे लगकर भी राजदेवी की पुजा–अर्चना करने का सौभाग्य हरेक भक्तजन प्राप्त करना चाहते है ।

दशमी भर शक्तिपीठ के रुपमे प्रसीद्ध रही माता राजदेवी की पूजा–आराधना के अपना अगल महत्व और विधि–विधान की मान्यता रहा है । वैसे तो वर्षभर राजदेवी की पुजा–पाठ निष्ठा एवं श्रद्धापूर्वक किया जाता है, लेकिन साल मे एक बार विजया दशमी के महाअष्टमी की रात मे बली प्रदान करने की परम्परा रहा है । जो वर्षों से आज तक निरन्तर जारी है ।

विजया दशमीके अवसर मे स्थानीय क्लब एवं विभिन्न संघ–संस्था के विशेष सक्रियता मे राजदेवी मन्दिर सहित बौद्धीमाई और अमरखना माताके मन्दिर को दुल्हिन की तरह सर–सजावट की जाती है । जो बहुत मनोरम दिखाई देता है ।

घटस्थापना से लेके दशमी भर माँता राजदेवी की मन्दिर मे एक पल के लिए भी भक्तजन की कमी महसुस नही होता । घटस्थापना के कुछ दिन पूर्व से ही राजदेवी मन्दिर के प्रांगण और मुलद्धार का सजावट ( डेकोेरेशन ) निर्माण स्थानीय महावीर युवा कमिटी के रेखदेख मे होता है तो बौद्धी माँता और अमरखना ( अन्नपूर्णा ) माँता के मन्दिर एवं प्रांगण सजावट की जिम्मेवारी स्थानीय राम युवा कमिटी को रहता है ।


सर–सफाई और सजावट सहित के विभिन्न कार्य मे नगरबासी भी अहम भूमिका निर्वाह करते है ।

कैसे सम्पन्न होता है राजदेवी की अलौकीक पूजा


कैसे सम्पन्न होता है राजदेवी की अलौकीक पूजा


घटस्थापना ः– जमरा उगाने के लिए राजदेवी माँता के मुल पीण्ड के नजदीक एक स्थान पर कलस स्थापना की जाती है । इसी तरह बौद्धी माँता के मन्दिर मे एक कलस स्थापना की जाती है ।

अमरखना ( अन्नपूर्णा ) माँता के मन्दिर मे कलस स्थापना की परम्परा नही रहा है । घटस्थापना दिन से लेकर दशमी भर भक्तजन एवं दाताओं के द्धारा संध्या आरती का आयोजन होता है ।

नोट : – घटस्थापना दिन से पंचमी तक नियमित विधि–विधान अनुसार ही माता की पुजापाठ की जाती है ।

पंचमी :– पंचमी दिन भैरब के आहवान के रुपमे बटुक भैरब के ध्वजा स्थापना किया जाता है । राजदेवी मन्दिर मे बटुक भैरब के स्थापना के पश्चात ही इस क्षेत्र के अन्य शक्तिपीठों मे बली प्रथा का शुभारम्भ हुआ मान्यता रहा है ।

षष्टी : – राम युवा कमिटी और महावीर युवा कमिटी लगायत का स्थानीय विभिन्न संघ–संस्था के सहयोग एवं मन्दिर का पुजारी, श्रद्धालु् भक्तजन, नगरवासी एवं स्थानीय पुलिस प्रशासन और नेपाली सेना के सहभागिता मे गाजा–बाजा सहित बेल नौती कार्यक्रम सम्पन्न होता है ।

जनकपुर के विषहरा कुटी नजदीक रहा बेल बृक्ष को सुपारी देकर चामुण्डा देवी के न्योता देकर आहवान किया जाता है ।

 

कैसे सम्पन्न होता है बेलतोरी


सप्तमी :– सप्तमी के दिन माता राजदेवी के विशेष सिंगार करने की परम्परा रही है । नगरवासी लोग आज के दिन अपने–अपने घर से आरती लाकर माता की विशेष आरती करने की पुराना परम्पार रहा है ।

आज के दिन देवी पुजा के विशेष महत्वपूर्ण माना जाता है । कल न्योता देकर आए बेल को तोड कर आज बेल तोरी सम्पन्न किया जाता है । युवा क्लब सब, विभिन्न मन्दिर का महन्थ, पुजारी, श्रद्धालु नगरवासी, स्थानीय प्रशासन और नेपाली सेना के विशेष उपस्थिति मे बेलतोरी सम्पन्न होता है ।

गाजा–बाजा के साथ हजारौं श्रद्धालु भक्तजान बेलतोरी मे सहभागी होते है । बोलतोरी के लिए राजदेवी मन्दिर से बाहर निकलते वक्त एक राउण्ड गोली सांकेतिक रुपमे स्थानीय प्रशासन द्धारा हवाई फायर किया जाता है ।

इसी तरह बेल तोडने के समय भी दो–तीन राउण्ड गोली हवाई फायर कर के सलामी दिया जाता है । सलामी देने के बाद ही बेलतोरी सम्पन्न किया जाता है । कुछ बेलपत्र और एक जोडा बेल तोड कर लाया जाता है जो मन्दिर मे रखा जाता है ।

इसी बीच मिथिलाञ्चल का प्रसीद्ध झिझिया नृत्य किया जाता है जो लगभग ४ साल पूर्व से प्रतियोगिता के रुपमे प्रारम्भ किया गया । इस मे प्रथम, द्धितिय एवं तृतिय विजेता को पुरस्कृत किया जाता है ।

महाअष्टमी : – महाअष्टमी की रात मे बली पुजा ( निजा पुजा ) करने के बाद बली प्रदान की जाती है । महाअष्टमी की तैयारी सप्तमी के रात से ही प्रारम्भ हो जाता है । महाअष्टमी के सम्पुर्ण कार्यक्रम राम युवा कमिटी और महावीर युवा कमिटी संयुक्त रुपमे आयोजन करते है ।

दर्शनाभिलाषी भक्तजन एवं बली प्रदान के लिए गाम–गाम से बोका लेकर आए लोगों के सुविधा के लिए राजदेवी मन्दिर के प्रांगण तक डोरी से लाइनिंग बनया जाता है । बोका चढाने आए भक्तजन के लिए निशुल्क भोजन का व्यवस्था किया जाता है ।

महाअष्टमी के रात मे राजदेवी मे बहुत ही ज्यादा बोका के बली प्रदान होने के कारण उस रात नगरमे रहा हरेक स्थानीय क्लब से सहयोग लिया जाता है और लगभग १५ सय स्वयंम सेवक परिचालन किया जाता है । जो मन्दिर के भितर और बाहर सुरक्षा प्रदान करते है ।

उसी तरह स्थानीय प्रशासन मन्दिर के चारो तरफ सुरक्षा व्यवस्था कडा कर सुरक्षा करते है । लगभग साम ७ बजे से शुरु बली प्रदान भोर साढे ४ बजे तक अनवरत रुपमे जारी रहता है ।

बली प्रदान के लिए पहले दो ठो ठेहा रखा जाता था लेकिन अब अधिक बली प्रदान होने के कारण ४ ठो ठेहा पर बली प्रदान होता है । बली प्रदान के लिए पहिले जनकपुर सिगरेट फैक्ट्री का कर्मचारी भी सामील हुवा करते थे ।

अब राम युवा कमिटी और महावीर युवा कमिटी सहित का स्वयंम सेवक द्धारा अलग–अलग ठेहा पर बली प्रदान करते है । हरेक वर्ष लगभग १५ हजार से १७ हजार के हाराहारी मे बली प्रदान होता है ।

नवमी : – महाअष्टमी के रातमे बली प्रदान नहोसका बाँकी बोका को नवमी के दिनमे बैद्धीमाई और अमरखना माई मे बली प्रदान किया जाता है । बली के बाद मन्दिर के सर–सफाई करने के बाद नौ ( ९ ) ठो ब्राम्हण पंडीत द्धारा हवन ( चण्डीपाठ ) किया जाता है ।

अक्षत, जौं, तिल, मिष्ठान, घी, चीनी, धुप, आम के पल्लव, आमके लकडी, नारीयल, लालबस्त्र से हवन किया जाता है ।

आज के दिन ९ रुप के भगवती के कुमारी भोजन और १ कुमार को भैरब के रुपमे दही, चुरा, मिष्ठान भोजन कराया जाता है । और उन लोगो को नयाँ वस्त्र और दक्षिणा दान किया जाता है । राम मन्दिर, हनुमान मन्दिर, बौद्धीमाई, अमरखना मन्दिर लगायत का मन्दिरों मे ध्वजा बदला जाता है ।

नवमी के साम मे राम युवा कमिटी द्धारा महा प्रसाद का आयोजन किया जाता है । जिसमे नगर के विशिष्ट व्यक्तित्व एवं स्थानीय प्रशासन को सहभागिता रहता है ।

दशमी :– आज का दिन आहवान किया गया सम्पूर्ण देवी–देवता को विर्सन किया जाता है । साथ ही सबेर १०–११ बजे भगवती मन्दिर मे उगाए गए जमरा एवं टीका सर्वसाधारण भक्तजन को वितरण किया जाता है ।

उसी दिन सबेर मे राम मन्दिर से राम–जानकी के डोला बाहर निकाला जाता है और धनुष सागर के परिक्रमा कर जनक मन्दिर मे टीका ग्रहण कर पुनः राम मन्दिर मे पहुच भगवान का डोला विश्राम करता है ।

उसी दिन ४ बजे पुनः राम भगवान के डोला मन्दिर से बाहर निकल कर नगर परिक्रमा करते हुवे दशरथ मन्दिर मे टीका ग्रहण, जानकी मन्दिर मे टीका ग्रहण, लक्ष्मण मन्दिर मे टीका ग्रहण कर पुनः भगवान राम के डोला राम मन्दिर मे आकर सम्पन्न होता है ।

दशमी के चार दिन बाद चोठारी पुजा होता है जिसे भगवती की शुद्ध पुजा माना जाता है । इस दिन सबेरे से लडु, मिठाई लगायत का विभिन्न पकवान के प्रसाद माता के अर्पित करने के लिए दिनभर श्रद्धालु भक्तजन लाइन मे लगा रहता है ।

श्रद्धालु भक्तजन लाइन मे


नोट :– घटस्थापना दिन से लेकर हरेक साम राजदेवी माता के मन्दिर मे संध्या भजन एवं धार्मिक सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन किया जाता है । दशमी भर हजारौं श्रद्धालु महिला–पुरुष तीन बजे रात मे राजदेवी मन्दिर के पट खुलने के बाद दिनभर पुजा–पाठ करते है ।

श्रद्धालु भक्तजनों के सुरक्षा एवं व्यवस्थापन के लिए राम युवा कमिटी और महावीर युवा कमिटी हरेक दिन व रात मे सयकडौं के संख्या मे स्वंयम सेवक परिचालन करते है । साथ ही स्थानीय पुलिस प्रशासन के उपस्थिति भी व्यापक रुपमे रहता है ।

इस क्षेत्र का साधु सन्त राजदेवी मन्दिर मे होते आ रहे बली प्रदान के परम्परा को रोकने का अथक प्रयास मे लगे रहते है लेकिन हरेक साल बली प्रदान मे बढोतरी होता जा रहा है । राम मन्दिर के प्रांगण मे सटके ही उतरवारी कात मे रही राजदेवी मिथिला के राजा जनक के कुल देवी के रुपमे रहे मान्यता रहा है ।  




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