लोक नाट्य जट–जटीन का सामाजिक सन्दर्भ I lok natya jatt jattin ka samajik sandarve

लोक नाट्य जट–जटीन का सामाजिक सन्दर्भ I lok natya jatt jattin ka samajik sandarve

पृष्ठभूमि :

लोक नाट्य जट–जटीन का सामाजिक सन्दर्भ-ऋग्वेद काल से ही लोक शब्द के प्रयोग हमे मिलता है । अर्थ और प्रसंग फरक हो सकता है लेकिन शिष्ट साहित्य के सामान्तर जनमानस मे सुरक्षित लोक साहित्य का भी विकास होता गया तथ्य हमें अनेकौं उदाहरण से मिलता है ।

लोक साहित्य को जनता की साहित्य कहा जाता है । शिष्ट साहित्य संस्कृत एवं शिक्षित व्यक्तियों के पृष्टपोषण साहित्य के रुपमे माना जाता है । शिष्ट साहित्य लिपिबद्ध होता है, जबकि लोक साहित्यका रचयिता अज्ञान होता है ।
वास्तवमे शिक्षित और बौद्धिक समाज ने शास्त्रीय विधि–विधान के आधार मे अपना हर्षोल्लास एवं चिन्तन का प्रदर्शन करने के लिए नाट्य विद्या को चयनीत किये थे । उही जनमानस द्धारा अपना प्रशन्नता, खुशी और विषय–वस्तु को स्वान्त : सुखाय प्रस्तुति के लिए इसी अभिनय विद्या को उपयोग किया ।

शास्त्रीय विधि द्धारा प्रतिपादित नाट्य विद्या “नाट्य शास्त्र” के रुपमे विद्धत वर्ग मे समादृत हुवे तो लोक भावना के प्रतिनिधित्व वाले लोक प्रदर्शन कला “ नोक नाट्य ” के रुपमे कलान्तर मे उल्लेख किया गया ।

लेकिन नाट्य के शास्त्रीय विद्या जैसा इसका लेखन नही हो सका । वह मौखिक और परम्परागत रुपमे ग्रामीण वातावरण मे निरन्तर जीवित रहते हुवे आज तक बच रहा है ।

शिष्ट लिखित नाट्यों का प्रारम्भ १६ औं शताब्दी से हुआ इतिहास रहा है, लेकिन लोक नाट्य व नाच की परम्परा १४ औं शताब्दी से प्रारम्भ हो चुकी थी जो ज्यातिरिश्वर ठाकुर ने अपने “ वर्णरत्नाकर” मे “ लोरक नाच ” के चर्चा से ज्ञात होता है ।

हमारे बीच आज भी नोक नाट्य एवं तरह–तरह की नाच विभिन्न रुप मे जीन्दा है । लेकिन उसका अवस्था आज का प्रविधि मैत्री समय मे कमजोर होता जा रहा है, जो निश्चित रुप से चिन्ताका विषय है । आज के समय मे अपनी विशिष्टता के साथ जनजीवन मे बच्ने मे सफल लोक नाट्य मध्ये “ जट–जटीन ” सब से अधिक लोकप्रिय रही है ।

चाहे नागरिक मंच हो अथवा ग्रामीण परिसर लोकजीवन के अनेकौं खटी–मीठी प्रसंग के साथ लोकानुरंजन के लिए अपना दायित्व निर्वाह करते आ रहे है । शास्त्रीय नाट्य लेखन से ज्यादा लोक नाट्य अधिक समय तक बच सकने की क्षमता रखती है । और ये विशेषता इसका पारम्परिक गायन पक्ष ही है ।

शिष्ट साहित्य मे नाट्य लेखन का इतिहास सोलहौं शताब्दी के बाद देखा जाता है । लेकिन नोक नाट्य वा नाच तेरहौं शताब्दी के पूर्व से ही समाज मे प्रचलित रहा ज्योतिरिश्वरी के “ वर्णरत्नाकर ” मे उल्लेख किया गया “ लोरिक ” नाच से सिद्ध होता है ।


तेरहौं शताब्दी से भी पुराना माना गया यह लोक नाट्य सब आज भी मैथिली समाज के भितर अपना उपस्थिति विभिन्न रुपमे देखाता आ रहा है । लेकिन समय और बदलता डिजिटल प्रविधि के आगमन से सिर्फ थोडी सी पिछे पड गया है ।

मैथिली लोक नाट्य मध्ये सामाचकेवा, डोमकछ और जट–जटीन मुख्य रुपमे आज भी व्यापकता के साथ देखा जा सकता है । सिर्फ महिलाओं की सहभागिता मे सम्पन्न होने वाले यह लोकधर्मी नाट्य सब गीति विनिमय के आधार मे सम्वाद स्थापित किया जाने वाला परम्परागत ऐसी लोकनाट्य सब है जिसे समाज की ललनाओं अपने जुवान एवं दिमाग मे रखकर सयकडौं साल से मनोरंजन करते आ रहे है ।


नोकनाट्य जट–जटीन


मिथिलाञ्चल मे सब से लोकप्रिय यह लोक नाट्य भोजपुरी, बज्जिका, मगही क्षेत्र मे भी प्रचलित रहा है, लेकिन इसका मौलिक रुप मैथिली भाषी क्षेत्र मे ही प्राप्त कर सकते है ।

कुछ विद्धान लोग इसे स्त्रीओं की मनोरंजन ( डा. जगदीशचन्द्र माथुर ) गीतात्मक लघु प्रहसन (डा. श्याम परमार ) कहा है । लेकिन वास्तव मे जट–जटीन गीत भितर का वस्तु स्थिति और इसका प्रदर्शन के समय को गम्भिरता पूर्वक मनन किया जाय तो इस लोक नाट्य के भितर सामाजिक पक्ष के अनेकन तरंगों बहुत सावधानी पूर्वक समाविष्ट किया गया हमे मिल सकता है ।

जिस से सामाजिक लोक जीवन मे आनेवाली तत्कालीन और दीर्घकालीन प्रेम, विरह, अवसाद को बहुत सटीक रुप मे प्रस्तुत किया गया देखा जाता है । सम्भवतः मिथिलाञ्चल मे प्रचलित अन्य लोक नाट्य से जट–जटीन को अधिक महत्व और लोकप्रियता के कारण भी ये ही होना जैसा लगता है ।

एक खास समय मे इसका प्रदर्शन और इससे मौसम और समाज दोनो को अपने गीत सम्वाद और अभिनय द्धारा प्रमाणित करने की क्षमताओं की प्रदर्शन कर सकने की अवस्थाओं की सृजन मामुली बात नही है ।


साउन–भादव महिना मे खेतीहर किसान जब पानी के अभाव मे त्राहीमाम् कर रहे होते है, आकाश मे हमारे पुर्खोें के गुहार मे बल प्रदान करने वाला एक लोक विधि अपनाकर इन्द्र देवता को प्रेम व दबाब से प्रभावित करने के लिए एक अनुष्ठान किया जाता है –लोकनाट्य जट–जटीन के प्रदर्शन से ।

बस इसी अनुष्ठान से ग्रामीण सामान्य वर्ग की महिलाओं ने जट–जटीन गीति नाट्य का शुभारम्भ करने से पहले बेंग के कुटकर घैला मे गोबर मे मिलाकर किसी झगडालु महिला के आंगन मे फेकने कि विधि किया जाता है ।

इसके बाद जिस महिला के आंगन मे फेका जाता है वह महिला जितना जोड से कराकर गाली करती है, इन्द्र देवता उतनी ही प्रशन्न होकर वर्षा होने का आदेश देते है सो विश्वास रहा है ।

गाली सुनने के पश्चात महिला मण्डली दो ग्रूप बनाकर जट–जटीन के रुपमे दो युवती के नेतृत्व मे आगे–पीछे झुमते हुवे नृत्यात्मक मुद्रामे गीत गाकर आंगिक और वाचिक दोनो हिसाब से एक किसिम के मनोरंजनपूर्ण प्रस्तुति करती है । इसमे पुरुष सहभागिता की पूर्णत : वर्जित किया जाता है लेकिन बच्चों को प्रदर्शन देखने की छुट होती है ।


सामान्य रुपमे जट–जटीन गीत नाट्य की प्रस्तुति कुछ घंटों की होती है, लेकिन इसे महिलाओं ने एक–डेढ घंटा मे समाप्त कर अपने–अपने घर वापस चली जाती है । इसमे ओ महिला लोग जट–जटीन के सिलसिलेवार गीतों की प्रस्तुति नही करती बल्कि कुछ खास मुखडा एवं गीतों की प्रस्तुति करती है । इतना करने के बाद इसका पूर्णता हुआ पूर्ण महसुस होता है ।

इसके कारण मे जट–जटीन लोक नाट्य एक पूर्ण कथात्मक प्रदर्शन है, जिसमे विवाह, आपसी असमझदारी, विदेश जाने वाले पति प्रति का मोह और अन्त मे मधुर मीलन की संयोग ।

इसके भितर सामान्य घटनाक्रम देखा जाता है, लेकिन वास्तव मे जट–जटीन की इसी सादगीपूर्ण अभिलेख से इसका स्तर एवं जीवन्तता को अन्य से अधिक लोकप्रिय बनाती है । और यह लोकनाट्य समाज से अधिक जोडने की प्रयास करती है ।

आज के २१ औं शताब्दी की आधुनिक सामाज के ग्रामीण सरजमीन मे भलेही ऐसा लोकप्रिय देखाने वालाें की अभाव है । लेकिन मंच मे, पर्दा मे आकर यह डिजिटल प्लेटफार्म मे भी सक्रिय रुपमे उपस्थित है । खास कर नागरिक रंगमंच मे आज जट–जटीन और डोमकछ जैसा लोकनाट्य अधिपत्य जमा चुका है । कलाकार लोग अपना अभिनय क्षमताओं के आधार मे बहुत उत्साहित होता है ऐसी प्रदर्शन से ।


जट–जटीन मे सामाजिकता


“ जट–जटीन ” लोकनृत्य की दो पाट होती है । एक पानी के लिए इन्द्र की स्तुति कर मनाने की प्रवृति और दुसरा होता है लोक जीवन की यथार्थ  चित्रण करते हुवे जट–जटीन के विवाह, सासुराल प्रसंग, पति–पत्नि बीच की अन्तर सम्वाद, मिलन और वियोग, एक–दुसरे के लिए छटपटाहट और अन्तत : अपना व्यक्तिगत इच्छा की त्याग कर एक–दुसरे के प्रति समप्रित होकर गृहस्थी मे सहभागी होना – यही प्रसंग के सिलसिलेवार है इस गीति नाटिका मे ।

प्रथम पक्ष पर विचार करे तो हमारी परम्परागत आस्था की केन्द्र रहा देवी–देवताओं के पूजा–अर्चना कर घर परिवार की सुख सम्पति की कामना की प्रचलन हमारे समाज मे परापूर्वकाल से चला आ रहा है ।

लेकिन मुख्यतः ऐसी पूजा–अनुष्ठान परिवार के श्रेष्ठ पुरुषजन द्धारा ही सम्पादित होता था । ऐसी अवस्था मे तत्कालीन सामाजिक आवश्यकता और सोच के कारण ही महिलाओं स्वतन्त्र रुपमे ऐसी धार्मिक अनुष्ठान मे सहभागी नही होती थी, सम्भवत : बडे–बुजुर्गों के स्वीकृति नही होने के कारण ।

इस तरह की अवस्था होते हुवे भी ग्रामीण महिलाओं, जो सामान्यत : अशिक्षित ही होती थी और उच्च वर्ग की महिलाओं की शिक्षित परिष्कृत विधि–व्यवहार से दुखी भी रहती थी । उन सबोंं ने एक सहज रास्ता अपनी भक्ति प्रदर्शन की निकाली । रात्री मे सामूहिक रुपमे अध्यात्मिक तुष्टी के लिए, सांस्कृतिक चेतना की प्रवद्र्धन झलकते हिसाव से कुछ पर्व, उत्सव, अनुष्ठानों की शुरुवात की ।

ऐसी पर्व, सांस्कृतिक उत्सव, अनुष्ठानों मे छठ, चौढचन्द्र, सामा–चकेवा, डोमकछ एवं जट–जटीन जैसा सामने आया जिसमे सिर्फ महिलाओं की एकल अधिपत्य हो गयी । ऐसी उत्सव, पर्वों परिवारिक सुख–शान्ति और आत्म सन्तोष के लिए समाज को महिलाओं की तर्फ से बहुत बडा देन है ।

स्त्री और पुरुष बीच की सहकार्य की पारंपरिक लोक विश्वास उस वक्त बहुत प्रबल था । आज के दिन मे हो रही महिला आरक्षण की राजनीतिक व्यवस्था का उस वक्त आवश्यकता नही थी । समाज द्धारा उस वक्त भी महिलाओं की उपादेयता को शिशु जन्म और पालन–पोषण के अतिरिक्त भी स्वीकार कर चुका था ।

लोक जीवन का ऐसी अनेकन प्रसंगों को जट–जटीन लोकनाट्य अपने कथानक भितर रखी है । अकाल होते प्रवल सम्भावना बीच गाम के पुरुष वर्ग पूजा–पाठ, एकाह–नवाह, सत्यनारायण भगवान की पूजा आदि अनुष्ठान पुरोहितों के सहयोग मे करते है ।

यह चिन्तन समाज मे व्याप्त लोकधारणा मे आधारित रहता है । इसका शुरुवात कब से और कैसे हुई–इतिहास नही है । और इसका कारण हुआ इतिहास लिखने वाले “ पढुवा ” समाज की निम्नवर्गिय समाजीक, सांस्कृतिक गतिविध प्रति उपेक्षाभाव रखने की प्रवृति । लेकिन महिलाओं ने इसे समन्वय रुपमे प्रस्तुत कर इस लोकनाट्य का दुसरे पक्ष को सबल रुप समाज मे स्थापित की ।

सारांस

लोक नाट्य जट–जटीन लोकजीवन मे सामान्यत : घटित होने वाले सामाजिक आहार–व्यवहार के जीवन्त दस्तावेज है, जो तत्कालीन सामाजिक मान्यता, विश्वास और विधि–विधान को गीति–सम्वाद के माध्यम से मनोरंजनार्थ प्रस्तुतिकरण कर महिला सशक्तिकरण एवं उनकी उपादेयता की मान्यता को स्थापित करने की प्रयास की है । 


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